श्री विष्णु पुराण  »  अंश 4: चतुर्थ अंश  »  अध्याय 13: सत्वतकी सन्ततिका वर्णन और स्यमन्तकमणिकी कथा  »  श्लोक 101
 
 
श्लोक  4.13.101 
धिक्त्वां यस्त्वमेवमर्थलिप्सुरेतच्च ते भ्रातृत्वान‍्मया क्षान्तं तदयं पन्थास्स्वेच्छया गम्यतां न मे द्वारकया न त्वया न चाशेषबन्धुभि: कार्यमलमलमेभिर्ममाग्रतोऽलीकशपथैरित्याक्षिप्य तत्कथां कथञ्चित्प्रसाद्यमानोऽपि न तस्थौ॥ १०१॥ स विदेहपुरीं प्रविवेश॥ १०२॥
 
 
अनुवाद
तुझे धिक्कार है, तू बड़ा लोभी है । तू मेरा भाई है, इसलिए मैं तुझे क्षमा करता हूँ । तेरा मार्ग खुला है, तू सुखपूर्वक जा । अब मुझे द्वारका से, तुझसे या अन्य किसी सम्बन्धी से कोई प्रयोजन नहीं है । बस, अब ये खोखली शपथें मेरे काम की नहीं ।' इस प्रकार उसके वचन संक्षिप्त होने और बार-बार समझाने पर भी वह वहाँ न रुका और विदेहनगर को चला गया ॥101-102॥
 
Shame on you, you are very greedy. Because you are my brother, I forgive you. Your path is open, you can go happily. Now I have no business with Dwarka, you or any other relatives. That's it, these empty oaths have no use for me now.' In this way, despite his words being cut short and his repeated persuasion, he did not stay there and went to Videhanagar.॥ 101-102॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)