या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यत:।
तां तृष्णां सन्त्यजेत्प्राज्ञस्सुखेनैवाभिपूर्यते॥ २६॥
दुर्मतियोंके लिये जो अत्यन्त दुस्त्यज है तथा वृद्धावस्थामें भी जो शिथिल नहीं होती, बुद्धिमान् पुरुष उस तृष्णाको त्यागकर सुखसे परिपूर्ण हो जाता है॥ २६॥
जीर्यन्ति जीर्यत: केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यत:।
धनाशा जीविताशा च जीर्यतोऽपि न जीर्यत:॥ २७॥
अनुवाद
जब आयु बढ़ती है, तो बाल और दाँत घिस जाते हैं, परन्तु जीवन और धन की आशाएँ वृद्ध होने पर भी नहीं क्षीण होतीं ॥27॥
When age grows old, hair and teeth become worn out, but the hopes of life and wealth do not wear out even when one grows old. ॥27॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥