| श्री विष्णु पुराण » अंश 4: चतुर्थ अंश » अध्याय 10: ययातिका चरित्र » श्लोक 26-27 |
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| | | | श्लोक 4.10.26-27  | या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यत:।
तां तृष्णां सन्त्यजेत्प्राज्ञस्सुखेनैवाभिपूर्यते॥ २६॥
दुर्मतियोंके लिये जो अत्यन्त दुस्त्यज है तथा वृद्धावस्थामें भी जो शिथिल नहीं होती, बुद्धिमान् पुरुष उस तृष्णाको त्यागकर सुखसे परिपूर्ण हो जाता है॥ २६॥
जीर्यन्ति जीर्यत: केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यत:।
धनाशा जीविताशा च जीर्यतोऽपि न जीर्यत:॥ २७॥ | | | | | | अनुवाद | | जब आयु बढ़ती है, तो बाल और दाँत घिस जाते हैं, परन्तु जीवन और धन की आशाएँ वृद्ध होने पर भी नहीं क्षीण होतीं ॥27॥ | | | | When age grows old, hair and teeth become worn out, but the hopes of life and wealth do not wear out even when one grows old. ॥27॥ | | ✨ ai-generated | | |
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