श्री विष्णु पुराण  »  अंश 4: चतुर्थ अंश  »  अध्याय 10: ययातिका चरित्र  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  4.10.23 
न जातु काम: कामानामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्द्धते॥ २३॥
 
 
अनुवाद
भोगों की प्यास भोगने से कभी नहीं बुझती, बल्कि घी की आहुति से अग्नि की तरह बढ़ती है॥ 23॥
 
The thirst for pleasures is never satiated by enjoying them; rather, it increases like fire by the offering of ghee.॥ 23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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