| श्री विष्णु पुराण » अंश 4: चतुर्थ अंश » अध्याय 1: वैवस्वतमनुके वंशका विवरण » श्लोक 89 |
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| | | | श्लोक 4.1.89  | यस्सृज्यते सर्गकृदात्मनैव
य: पाल्यते पालयिता च देव:।
विश्वात्मकस्संह्रियतेऽन्तकारी
पृथक्त्रयस्यास्यचयोऽव्ययात्मा॥ ८९॥ | | | | | | अनुवाद | | जो सृष्टिकर्ता होकर अपने आपको जगत् के रूप में रचता है; जो जगत् का पालनकर्ता होकर स्वयं ही स्थित है; जो संहारकर्ता होकर स्वयं ही नष्ट हो जाता है; तथा जो इन तीनों से भिन्न है, वही उनका अविनाशी स्वरूप है ॥89॥ | | | | Who, being the creator, creates himself in the form of the universe; who, being the sustainer of the world, is himself sustained; who, being the destroyer, is himself destroyed; and who is distinct from these three is their imperishable self. ॥ 89॥ | | ✨ ai-generated | | |
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