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श्लोक 4.1.87-88  |
पाकाय योऽग्नित्वमुपैति लोका-
न्बिभर्त्ति पृथ्वीवपुरव्ययात्मा।
शक्रादिरूपी परिपाति विश्व-
मर्केन्दुरूपश्च तमो हिनस्ति॥ ८७॥
करोति चेष्टाश्श्वसनस्वरूपी
लोकस्य तृप्तिं च जलान्नरूपी।
ददाति विश्वस्थितिसंस्थितस्तु
सर्वावकाशं च नभस्स्वरूपी॥ ८८॥ |
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| अनुवाद |
| जो प्राणों के रूप में प्राणियों में कार्य करते हैं, जो जल और अन्न के रूप में जगत को तृप्त करते हैं और जो जगत की स्थिति में लगे हुए भी आकाश के रूप में सबको विश्राम देते हैं ॥88॥ |
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| Who works in the living beings in the form of breath, who satisfies the world in the form of water and food and who, being engaged in the condition of the world, gives rest to everyone in the form of sky. 88॥ |
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