श्री विष्णु पुराण  »  अंश 4: चतुर्थ अंश  »  अध्याय 1: वैवस्वतमनुके वंशका विवरण  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  4.1.85 
यस्य प्रसादादहमच्युतस्य
भूत: प्रजासृष्टिकरोऽन्तकारी।
क्रोधाच्च रुद्र: स्थितिहेतुभूतो
यस्माच्च मध्ये पुरुष: परस्मात्॥ ८५॥
 
 
अनुवाद
जिनकी कृपा से मैं प्रजाओं का रचयिता हूँ, जिनके क्रोध से रुद्र जगत् के रचयिता हैं और जिनकी दिव्य शक्ति से जगत् के रचयिता विष्णु रूपी पुरुष का आविर्भाव हुआ है ॥85॥
 
By whose grace I am the creator of the people, by whose anger Rudra is the creator of the universe and by whose divine power the man in the form of Vishnu, who is the creator of the world, has emerged. 85॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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