श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 8: विष्णु भगवान‍्की आराधना और चातुर्वर्ण्य-धर्मका वर्णन  »  श्लोक 34-35
 
 
श्लोक  3.8.34-35 
दानं च दद्याच्छूद्रोऽपि पाकयज्ञैर्यजेत च।
पित्र्यादिकं च तत्सर्वं शूद्र: कुर्वीत तेन वै॥ ३४॥
भृत्यादिभरणार्थाय सर्वेषां च परिग्रह:।
ऋतुकालेऽभिगमनं स्वदारेषु महीपते॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! शूद्र के लिए दान देना, बलिवैश्वदेव या नमस्कार जैसे छोटे-छोटे यज्ञ करना, पितृश्राद्ध आदि कर्म करना, अपने आश्रित परिवार के सदस्यों के भरण-पोषण के लिए सभी वर्णों से धन इकट्ठा करना तथा मासिक धर्म के समय अपनी पत्नी के साथ सहवास करना उचित है।
 
O King! It is appropriate for a Shudra to give charity, perform small sacrifices like Balivaishwadeva or Namaskar, perform rituals like Pitrashradh, etc., collect wealth from all castes for the maintenance of his dependent family members and have sexual intercourse with his own wife during her menstrual period.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)