श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 8: विष्णु भगवान‍्की आराधना और चातुर्वर्ण्य-धर्मका वर्णन  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.8.10 
यजन्यज्ञान्यजत्येनं जपत्येनं जपन्नृप।
निघ्नन्नन्यान्हिनस्त्येनं सर्वभूतो यतो हरि:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! जो मनुष्य यज्ञ करता है, वह उन्हीं को भजता है, जो उनका नाम जपता है, वह उन्हीं को भजता है और जो मनुष्य दूसरों को कष्ट पहुँचाता है, वह उन्हीं को कष्ट पहुँचाता है; क्योंकि भगवान हरि सर्वव्यापी हैं॥10॥
 
O King! A person who performs sacrifices, worships Him alone, a person who chants His name, worships Him alone, and a person who harms others, harms Him alone; because Lord Hari is the omnipresent being.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)