श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 7: यमगीता  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.7.33 
कमलनयन वासुदेव विष्णो
धरणिधराच्युत शङ्खचक्रपाणे।
भव शरणमितीरयन्ति ये वै
त्यज भट दूरतरेण तानपापान्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
हे कमलनेत्र! हे वासुदेव! हे विष्णु! हे धरणीधर! हे अच्युत! हे शंख और चक्रधारी! हमें शरण दीजिए - इस प्रकार पुकारने वाले उन भोले पुरुषों को दूर से ही त्याग देना चाहिए ॥ 33॥
 
"O Lotus-eyed one! O Vasudeva! O Vishnu! O Dharnidhar (Dharan)! O Achyuta! O holder of the conch and chakra! Please give us shelter" - those innocent persons who call out in this manner should be abandoned from a distance. ॥ 33॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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