श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 7: यमगीता  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  3.7.23 
स्फटिकगिरिशिलामल: क्व विष्णु-
र्मनसि नृणां क्व च मत्सरादिदोष:।
न हि तुहिनमयूखरश्मिपुञ्जे
भवति हुताशनदीप्तिज: प्रताप:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
कहाँ स्फटिक के समान पवित्र भगवान विष्णु और कहाँ मनुष्यों के मन में रहने वाला राग-द्वेष रूपी दुर्गुण? [इन दोनों का मेल नहीं हो सकता] हिमकर (चन्द्रमा) के किरणजाल में अग्नि की गर्मी कभी नहीं रह सकती।॥23॥
 
Where is Lord Vishnu, who is as pure as a crystal stone, and where is the evil of attachment and hatred that resides in the minds of humans? [There can be no combination of these two] The heat of fire can never remain in the ray net of Himkar (Moon). 23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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