श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 7: यमगीता  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  3.7.22 
कनकमपि रहस्यवेक्ष्य बुद्धॺा
तृणमिव यस्समवैति वै परस्वम्।
भवति च भगवत्यनन्यचेता:
पुरुषवरं तमवेहि विष्णुभक्तम्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
जो एकान्त में लेटे हुए दूसरे के सोने को देखकर भी उसे बुद्धि से तिनके के समान समझता है और अनन्य भाव से निरन्तर भगवान् का चिन्तन करता है, उस महापुरुष को विष्णुभक्त जानिये॥22॥
 
The one who, even after seeing someone else's gold while lying in solitude, considers it like a straw with his intellect and constantly thinks about God with undivided attention, know that great man to be a devotee of Vishnu. 22॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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