श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 7: यमगीता  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.7.20 
यम उवाच
न चलति निजवर्णधर्मतो य:
सममतिरात्मसुहृद्विपक्षपक्षे।
न हरति न च हन्ति किञ्चिदुच्चै:
सितमनसं तमवेहि विष्णुभक्तम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
यमराज बोले - जो मनुष्य अपने जाति-धर्म से विचलित नहीं होता, अपने मित्रों और विरोधियों के प्रति समान भाव रखता है, किसी का धन नहीं चुराता और किसी प्राणी की हिंसा नहीं करता, उस मनुष्य को आसक्ति से अत्यंत रहित और शुद्ध मन वाला भगवान विष्णु का भक्त जानिये॥20॥
 
Yamraj said - The man who is not deviated from his caste-religion, has equal feelings towards his friends and opponents, does not steal anyone's wealth and does not do violence to any living being, know that person to be a devotee of Lord Vishnu who is extremely free from attachment and pure in mind. 20॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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