श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 6: सामवेदकी शाखा, अठारह पुराण और चौदह विद्याओंके विभागका वर्णन  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  3.6.13-14 
सैन्धवान‍्मुञ्जिकेशश्च द्वेधाभिन्नास्त्रिधा पुन:।
नक्षत्रकल्पो वेदानां संहितानां तथैव च॥ १३॥
चतुर्थस्स्यादांगिंरसश्शान्तिकल्पश्च पञ्चम:।
श्रेष्ठास्त्वथर्वणामेते संहितानां विकल्पका:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
सैन्धव से अध्ययन करके मुंजिकेशन् ने अपनी संहिता को पहले दो और फिर तीन भागों में विभाजित किया [इस प्रकार पाँच]। नक्षत्रकल्प, वेदकल्प, संहिताकल्प, अंगिराकल्प और शांतिकल्प - उनके द्वारा रचित ये पाँच भाग अथर्ववेद संहिताओं में सर्वश्रेष्ठ हैं॥13-14॥
 
After studying from Saindhava, Munjikesan divided his Samhita first into two and then three [thus making five] parts. Nakshatrakalpa, Vedakalpa, Samhitakalpa, Angirakalpa and Shantikalpa – these five parts composed by him are the best among Atharvaveda Samhitas.॥13-14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)