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श्री विष्णु पुराण
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अंश 3: तृतीय अंश
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अध्याय 5: शुक्लयजुर्वेद तथा तैत्तिरीय यजु:शाखाओंका वर्णन
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श्लोक 27
श्लोक
3.5.27
याज्ञवल्क्यस्तदा प्राह प्रणिपत्य दिवाकरम्।
यजूंषि तानि मे देहि यानि सन्ति न मे गुरौ॥ २७॥
अनुवाद
तब याज्ञवल्क्यजी ने उन्हें प्रणाम करके कहा - "कृपया मुझे वे यजु श्रुतियाँ सिखाएँ जिन्हें मेरे गुरु भी नहीं जानते।"॥27॥
Then Yagyavalkya bowed to him and said, “Please teach me those Yaju Shrutis which even my Guru does not know.”॥ 27॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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