श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 5: शुक्लयजुर्वेद तथा तैत्तिरीय यजु:शाखाओंका वर्णन  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  3.5.19 
बिभर्त्ति यस्सुरगणानाप्यायेन्दुं स्वरश्मिभि:।
स्वधामृतेन च पितॄंस्तस्मै तृप्त्यात्मने नम:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
जो अपनी किरणों से चन्द्रमा को पुष्ट करते हैं और अपने स्वरूपरूपी अमृत से देवताओं को तृप्त करते हैं, उन सूर्यदेव को नमस्कार है॥19॥
 
Salutations to the Sun God who nourishes the moon with his rays and satisfies the gods with the nectar of his own form, the Sun God. 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)