श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 5: शुक्लयजुर्वेद तथा तैत्तिरीय यजु:शाखाओंका वर्णन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.5.15 
याज्ञवल्क्योऽपि मैत्रेय प्राणायामपरायण:।
तुष्टाव प्रयतस्सूर्यं यजूंष्यभिलषंस्तत:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् याज्ञवल्क्य ने भी यजुर्वेदप्राप्ति की इच्छा से प्राणों को संयमित किया और संयमित मन से सूर्यदेव की स्तुति की ॥15॥
 
Thereafter, Yajnavalkya also controlled his life with the desire to attain Yajurveda and praised the Sun God with a balanced mind. 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)