श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 5: शुक्लयजुर्वेद तथा तैत्तिरीय यजु:शाखाओंका वर्णन  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  3.5.1-2 
श्रीपराशर उवाच
यजुर्वेदतरोश्शाखास्सप्तविंशन्महामुनि:।
वैशम्पायननामासौ व्यासशिष्यश्चकार वै॥ १॥
शिष्येभ्य: प्रददौ ताश्च जगृहुस्तेऽप्यनुक्रमात्॥ २॥
 
 
अनुवाद
श्री पाराशर जी बोले- हे महामुनि! व्यास जी के शिष्य वैशम्पायन ने यजुर्वेद रूपी वृक्ष की सत्ताईस शाखाओं की रचना करके अपने शिष्यों को उपदेश दिया और शिष्यों ने भी उन्हें क्रमशः ग्रहण किया। 1-2.
 
Shri Parashar Ji said- O great sage! Vyasa's disciple Vaishampayana composed twenty seven branches of the tree of Yajurveda and taught them to his disciples and the disciples also accepted them gradually. 1-2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)