श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 2: सावर्णिमनुकी उत्पत्ति तथा आगामी सात मन्वन्तरोंके मनु, मनुपुत्र, देवता, इन्द्र और सप्तर्षियोंका वर्णन  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  3.2.56 
कृते युगे परं ज्ञानं कपिलादिस्वरूपधृक्।
ददाति सर्वभूतात्मा सर्वभूतहिते रत:॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
वह सर्वशक्तिमान आत्मा, जो सम्पूर्ण प्राणियों के कल्याण के लिए तत्पर है, सत्ययुग में कपिल का मूल रूप धारण करके परम ज्ञान का उपदेश करता है ॥56॥
 
That omnipotent soul, who is ready for the welfare of all living beings, preaches the supreme knowledge by assuming the original form of Kapil in Satyayuga. 56॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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