श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 18: मायामोह और असुरोंका संवाद तथा राजा शतधनुकी कथा  »  श्लोक 80
 
 
श्लोक  3.18.80 
नरेन्द्र स्मर्यतामात्मा ह्यलं ते गृध्रचेष्टया।
पाषण्डालापजातोऽयं दोषो यद‍्गृध्रतां गत:॥ ८०॥
 
 
अनुवाद
हे नरेन्द्र! तुम अपने स्वरूप का स्मरण करो; इन लोभमय चेष्टाओं को त्याग दो। पाखण्डी के साथ वार्तालाप करने के दोष के कारण ही तुम अशुद्ध हुए हो। 80॥
 
Hey Narendra! You remember your form; Give up these greedy efforts. It is because of the fault of conversing with a hypocrite that you have become impure. 80॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)