vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री विष्णु पुराण
»
अंश 3: तृतीय अंश
»
अध्याय 18: मायामोह और असुरोंका संवाद तथा राजा शतधनुकी कथा
»
श्लोक 45
श्लोक
3.18.45
देवादिनि:श्वासहतं शरीरं यस्य वेश्म च।
न तेन संकरं कुर्याद् गृहासनपरिच्छदै:॥ ४५॥
अनुवाद
जिसका शरीर या घर देवता आदि के निःश्वास से नष्ट हो गया हो, उसके साथ अपना घर, आसन, वस्त्र आदि नहीं जोड़ना चाहिए ॥45॥
One should not associate his house, seat, clothes etc. with the one whose body or household is destroyed by the exhalation of the deity etc. ॥ 45॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×