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श्री विष्णु पुराण
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अंश 3: तृतीय अंश
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अध्याय 18: मायामोह और असुरोंका संवाद तथा राजा शतधनुकी कथा
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श्लोक 43
श्लोक
3.18.43
देवर्षिपितृभूतानि यस्य नि:श्वस्य वेश्मनि।
प्रयान्त्यनर्चितान्यत्र लोके तस्मान्न पापकृत्॥ ४३॥
अनुवाद
जिसके घर से देवता, ऋषि, पितर और भूत-प्रेत आदि बिना पूजे चले जाते हैं, उससे बड़ा पापी संसार में कोई नहीं है ॥ 43॥
There is no greater sinner in the world than the man from whose house the gods, sages, ancestors and ghosts leave without being worshipped. ॥ 43॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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