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श्री विष्णु पुराण
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अंश 3: तृतीय अंश
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अध्याय 18: मायामोह और असुरोंका संवाद तथा राजा शतधनुकी कथा
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श्लोक 37
श्लोक
3.18.37
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थस्तथाश्रमी।
परिव्राड् वा चतुर्थोऽत्र पञ्चमो नोपपद्यते॥ ३७॥
अनुवाद
ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी-ये ही चार आश्रम हैं। इनके अतिरिक्त कोई पाँचवाँ आश्रम नहीं है॥ 37॥
Brahmachari, Grihastha, Vanaprastha and Sanyasi-these are the only four ashramas. Apart from these there is no fifth ashrama.॥ 37॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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