श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 18: मायामोह और असुरोंका संवाद तथा राजा शतधनुकी कथा  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  3.18.29 
तृप्तये जायते पुंसो भुक्तमन्येन चेत्तत:।
कुर्याच्छ्राद्धं श्रमायान्नं न वहेयु: प्रवासिन:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
यदि मनुष्य दूसरे का अन्न खाकर तृप्त हो सकता है, तो फिर विदेश यात्रा में भोजन सामग्री ले जाने का कष्ट उठाने की क्या आवश्यकता है; पुत्रों को चाहिए कि वे घर पर ही श्राद्ध करें।
 
If a man can be satisfied by eating the food of someone else, then what is the need of taking the trouble of carrying food items while travelling abroad; the sons should perform the Shraddha at home itself.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)