श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 18: मायामोह और असुरोंका संवाद तथा राजा शतधनुकी कथा  »  श्लोक 102
 
 
श्लोक  3.18.102 
दूरतस्तैस्तु सम्पर्कस्त्याज्यश्चाप्यतिपापिभि:।
पाषण्डिभिर्दुराचारैस्तस्मात्तान्परिवर्जयेत्॥ १०२॥
 
 
अनुवाद
इन पाखण्डी, दुष्ट और घोर पापियों की संगति दूर से ही त्याग देनी चाहिए, अतः इनसे सदैव दूर रहना चाहिए॥102॥
 
The company of these hypocrites, wicked and extreme sinners is to be avoided from afar. Therefore, one should always avoid them.॥ 102॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)