श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 18: मायामोह और असुरोंका संवाद तथा राजा शतधनुकी कथा  »  श्लोक 100
 
 
श्लोक  3.18.100 
सहालापस्तु संसर्ग: सहास्या चातिपापिनी।
पाषण्डिभिर्दुराचारैस्तस्मात्तान्परिवर्जयेत्॥ १००॥
 
 
अनुवाद
इन दुष्ट पाखंडियों से बातचीत करना, सम्पर्क रखना और संगति करना महान पाप है; इसलिए इन सब बातों का त्याग कर देना चाहिए ॥ 100॥
 
Talking, keeping in touch and associating with these wicked hypocrites is a great sin; therefore one should give up all these things.॥ 100॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)