श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 17: नग्नविषयक प्रश्न, देवताओंका पराजय, उनका भगवान‍्की शरणमें जाना और भगवान‍्का मायामोहको प्रकट करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.17.5 
श्रीपराशर उवाच
ऋग्यजुस्सामसंज्ञेयं त्रयी वर्णावृतिर्द्विज।
एतामुज्झति यो मोहात्स नग्न: पातकी द्विज:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
श्री पराशरजी बोले - हे द्विज! ऋक्, साम और यजु: ये वैदिक वर्णों के आवरण रूप हैं। जो मनुष्य आसक्तिवश इनका त्याग कर देता है, वह पापी 'नग्न' कहलाता है। 5॥
 
Shri Parasharji said – O Dwij! Rik, Sama and Yaju: This is the cover form of the Vedic alphabets. The man who renounces it out of attachment is called a sinner 'naked'. 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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