श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 17: नग्नविषयक प्रश्न, देवताओंका पराजय, उनका भगवान‍्की शरणमें जाना और भगवान‍्का मायामोहको प्रकट करना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.17.4 
को नग्न: किं समाचारो नग्नसंज्ञां नरो लभेत् ।
नग्नस्वरूपमिच्छामि यथावत्कथितं त्वया।
श्रोतुं धर्मभृतां श्रेष्ठ न ह्यस्त्यविदितं तव॥ ४॥
 
 
अनुवाद
नंगा कौन है? और कौन-सा आचरण मनुष्य को नंगा बनाता है? हे पुण्यात्माओं में श्रेष्ठ! मैं आपसे नंगों के स्वरूप का यथार्थ वर्णन सुनना चाहता हूँ; क्योंकि आप किसी भी बात से अनभिज्ञ नहीं हैं।॥4॥
 
Who is naked? And what kind of conduct makes a man naked? O best of the virtuous! I want to hear from you the true description of the nature of the naked; because you are not ignorant of anything. ॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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