श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 17: नग्नविषयक प्रश्न, देवताओंका पराजय, उनका भगवान‍्की शरणमें जाना और भगवान‍्का मायामोहको प्रकट करना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  3.17.32 
शुक्लादिदीर्घादिघनादिहीन-
मगोचरं यच्च विशेषणानाम्।
शुद्धातिशुद्धं परमर्षिदृश्यं
रूपाय तस्मै भगवन्नता: स्म:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
हे भगवन्! हम आपके उस स्वरूप को नमस्कार करते हैं जो श्वेत रूप, लम्बाई आदि, आकार और घनत्व आदि गुणों से रहित है, इस प्रकार जो समस्त विशेषणों का विषय है, परम मुनियों को दिखाई देता है तथा शुद्ध एवं पवित्र है। 32॥
 
Oh God! We salute that form of yours which is free from the white form, length etc., size and density etc. qualities, thus which is the subject of all adjectives, and is visible to the supreme sages and is pure and pure. 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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