श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 17: नग्नविषयक प्रश्न, देवताओंका पराजय, उनका भगवान‍्की शरणमें जाना और भगवान‍्का मायामोहको प्रकट करना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  3.17.30 
तिर्यङ्मनुष्यदेवादि व्योमशब्दादिकं च यत्।
रूपं तवादे: सर्वस्य तस्मै सर्वात्मने नम:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
तिर्यक, मनुष्य और देवता आदि प्राणी, आकाश आदि पंचभूत और शब्द आदि उनके गुण- ये सब, सबके मूल स्रोत आपके ही स्वरूप हैं; अतः परमात्मा को नमस्कार है ॥30॥
 
Tiryak, humans and gods etc. creatures, sky etc. Panchabhoots and words etc. their qualities - all these, the original source of all are your forms; Therefore, salutations to the Supreme Soul. 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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