श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 17: नग्नविषयक प्रश्न, देवताओंका पराजय, उनका भगवान‍्की शरणमें जाना और भगवान‍्का मायामोहको प्रकट करना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  3.17.29 
यज्ञाङ्गभूतं यद्‍रूपं जगत: स्थितिसाधनम्।
वृक्षादिभेदैष्षड्भेदि तस्मै मुख्यात्मने नम:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
जो संसार की स्थिति का साधन और यज्ञ का अभिन्न अंग है तथा जो वृक्ष, लता, पुष्प, विरुद्ध, तृण और गिरि ये छह भेदों से युक्त है, उस मूल (उद्भिद) रूप को नमस्कार है॥29॥
 
Salutations to you, the main (Udbhid) form which is the means of the state of the world and an integral part of the Yagya and which has the six divisions of tree, creeper, flower, virudha, trin and giri. 29॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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