श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 17: नग्नविषयक प्रश्न, देवताओंका पराजय, उनका भगवान‍्की शरणमें जाना और भगवान‍्का मायामोहको प्रकट करना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  3.17.27 
प्रवृत्त्या रजसो यच्च कर्मणां करणात्मकम्।
जनार्दन नमस्तस्मै त्वद्‍रूपाय नरात्मने॥ २७॥
 
 
अनुवाद
हे जनार्दन! मैं आपके उस मनुष्य रूप को नमस्कार करता हूँ जो रजोगुण की प्रवृत्ति के कारण कर्मों का कारण है ॥27॥
 
O Janardan, I salute that human form of Yours which is the cause of actions due to the tendency of Rajoguna. ॥27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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