श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 17: नग्नविषयक प्रश्न, देवताओंका पराजय, उनका भगवान‍्की शरणमें जाना और भगवान‍्का मायामोहको प्रकट करना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  3.17.13 
तथाप्यरातिविध्वंसध्वस्तवीर्याभयार्थिन:।
त्वां स्तोष्यामस्तवोक्तीनां याथार्थ्यं नै वगोचरे॥ १३॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! यद्यपि आपका वास्तविक स्वरूप वाणी का विषय नहीं है, तथापि शत्रुओं के हाथों नष्ट होकर शक्तिहीन हो जाने पर भी अभय प्राप्त होने के कारण हम आपकी स्तुति करते हैं॥13॥
 
Oh, Lord! Although your true form is not the subject of speech, yet we praise you for attaining fearlessness after being destroyed by the hands of enemies and becoming powerless. 13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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