श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 16: श्राद्ध-कर्ममें विहित और अविहित वस्तुओंका विचार  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.16.18 
अपि नस्ते भविष्यन्ति कुले सन्मार्गशीलिन:।
गयामुपेत्य ये पिण्डान्दास्यन्त्यस्माकमादरात्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
क्या हमारे कुल में ऐसे पुण्यात्मा पुरुष होंगे जो गया जाकर आदरपूर्वक हमारा पिण्डदान करेंगे?॥18॥
 
‘Will there be such virtuous persons in our family who will go to Gaya and respectfully offer Pind-Daan for us?॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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