श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 16: श्राद्ध-कर्ममें विहित और अविहित वस्तुओंका विचार  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  3.16.12-13 
षण्ढापविद्धचाण्डालपापिपाषण्डिरोगिभि:।
कृकवाकुश्वनग्नैश्च वानरग्रामसूकरै:॥ १२॥
उदक्यासूतकाशौचिमृतहारैश्च वीक्षिते।
श्राद्धे सुरा न पितरो भुञ्जते पुरुषर्षभ॥ १३॥
 
 
अनुवाद
हे महात्मन! नपुंसक, अपवित्र (पुण्यात्माओं द्वारा बहिष्कृत), चाण्डाल, पापी, विधर्मी, रोगी, मुर्गी, कुत्ता, नंगा (वैदिक कर्मों का परित्याग करने वाला पुरुष), बन्दर, गाँव का सूअर, रजस्वला स्त्री, जन्म या मृत्यु की अशुद्धि वाला तथा शव को ढोने वाला मनुष्य - इनमें से किसी के भी दर्शन से न तो देवता और न ही पितर श्राद्ध में भाग लेते हैं। 12-13॥
 
O great man! The impotent, the impure (excommunicated by the virtuous), the Chandala, the sinner, the heretic, the patient, the poultry, the dog, the naked (the man who has given up Vedic rites), the monkey, the village pig, the menstruating woman, the person with impurity of birth or death and the man carrying the dead body - due to the sight of any of these, neither the gods nor the ancestors take part in the Shraddha. 12-13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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