श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 15: श्राद्ध-विधि  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  3.15.35 
पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामह:।
तृप्तिं प्रयान्तु मे भक्त्या मयैतत्समुदाहृतम्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
[चूँकि मैं श्राद्ध के रूप में कुछ भी देने में असमर्थ हूँ] मैंने जो कुछ भक्तिपूर्वक कहा है, उसी भक्ति से मेरे पिता, पितामह और परदादा संतुष्ट हों ॥35॥
 
[Since I am unable to offer anything by way of Shraddha] whatever I have said with devotion, may my father, grandfather and great grandfather be satisfied with that devotion alone. ॥ 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)