| श्री विष्णु पुराण » अंश 3: तृतीय अंश » अध्याय 14: श्राद्ध-प्रशंसा, श्राद्धमें पात्रापात्रका विचार » श्लोक 30 |
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| | | | श्लोक 3.14.30  | न मेऽस्ति वित्तं न धनं च नान्य-
च्छ्राद्धोपयोग्यं स्वपितॄन्नतोऽस्मि।
तृप्यन्तु भक्त्या पितरो मयैतौ
कृतौ भुजौ वर्त्मनि मारुतस्य॥ ३०॥ | | | | | | अनुवाद | | मेरे पास न तो धन है, न संपत्ति, न ही श्राद्ध कर्म के योग्य कोई अन्य सामग्री। अतः मैं अपने पितरों को प्रणाम करता हूँ। मेरी भक्ति से ही उन्हें तृप्ति मिले। मैंने अपनी दोनों भुजाएँ आकाश में उठाई हैं।॥30॥ | | | | ‘I have neither money nor wealth nor any other material suitable for performing Shraddha Karma. Therefore, I bow before my forefathers. May they get satisfaction only by my devotion. I have raised both my arms in the sky.''॥ 30॥ | | ✨ ai-generated | | |
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