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श्री विष्णु पुराण
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अंश 3: तृतीय अंश
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अध्याय 14: श्राद्ध-प्रशंसा, श्राद्धमें पात्रापात्रका विचार
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श्लोक 25
श्लोक
3.14.25
असमर्थोऽन्नदानस्य धान्यमामं स्वशक्तित:।
प्रदास्यति द्विजाग्रॺेभ्य: स्वल्पाल्पां वापि दक्षिणाम्॥ २५॥
अनुवाद
अथवा जो भोजन कराने में भी असमर्थ होकर श्रेष्ठ ब्राह्मणों को कच्चा अन्न और थोड़ी सी दक्षिणा देता है ॥ 25॥
Or being unable to even offer food, he who gives raw grain and a small amount of dakshina to the best of the brahmins.॥ 25॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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