श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 14: श्राद्ध-प्रशंसा, श्राद्धमें पात्रापात्रका विचार  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  3.14.19 
गायन्ति चैतत्पितर: कदानु
वर्षामघातृप्तिमवाप्य भूय:।
माघासितान्ते शुभतीर्थतोयै-
र्यास्याम तृप्तिं तनयादिदत्तै:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
पितर लोग सदैव गाते हैं कि वर्षा ऋतु के मघानक्षत्र (भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी) में तृप्त होकर माघ की अमावस्या को अपने पुत्र-पौत्रों द्वारा दिए गए तीर्थों के जल से हम कब तृप्त होंगे? 19॥
 
The ancestors always sing that after getting satisfied in the Maghanakshatra of the rainy season (Bhadrapada Shukla Trayodashi), when will we get satisfaction from the water of holy places given by our sons and grandchildren on the Amavasya of Magh? 19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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