श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 14: श्राद्ध-प्रशंसा, श्राद्धमें पात्रापात्रका विचार  »  श्लोक 12-14
 
 
श्लोक  3.14.12-14 
श्रीसनत्कुमार उवाच
वैशाखमासस्य च या तृतीया
नवम्यसौ कार्तिकशुक्लपक्षे।
नभस्य मासस्य च कृष्णपक्ष
त्रयोदशी पञ्चदशी च माघे॥ १२॥
एता युगाद्या: कथिता: पुराणे-
ष्वनन्तपुण्यास्तिथयश्चतस्र:।
उपप्लवे चन्द्रमसो रवेश्च
त्रिष्वष्टकास्वप्ययनद्वये च॥ १३॥
पानीयमप्यत्र तिलैर्विमिश्रं
दद्यात्पितृभ्य: प्रयतो मनुष्य:।
श्राद्धं कृतं तेन समासहस्रं
रहस्यमेतत्पितरो वदन्ति॥ १४॥
 
 
अनुवाद
श्री सनत्कुमारजी बोले - वैशाख मास की शुक्ल तृतीया, कार्तिक शुक्ल नवमी, भाद्रपद कृष्ण त्रयोदशी और माघ मास की अमावस्या - ये चार तिथियाँ पुराणों में 'युगाद्या' कही गई हैं। ये चारों तिथियाँ अक्षय पुण्य प्रदान करने वाली हैं। चन्द्रमा या सूर्य के ग्रहण के समय, तीनों अष्टकों में अथवा उत्तरायण या दक्षिणायन के प्रारम्भ में जो मनुष्य एकाग्र मन से पितरों के लिए तिल सहित जल का दान करता है, वह मानो एक हजार वर्षों तक श्राद्ध करता है - यह परम रहस्य है, जो स्वयं पितर कहते हैं। 12-14॥
 
Shri Sanat Kumarji said – Shukla Tritiya of Vaishakh month, Kartik Shukla Navami, Bhadrapada Krishna Trayodashi and Amavasya of Magh month – these four dates are called ‘Yugadya’ in the Puranas. These four dates give eternal blessings. At the time of eclipse of the Moon or the Sun, in the three Ashtakas or at the beginning of Uttarayan or Dakshinayan, the person who donates water along with sesame seeds to the ancestors with a concentrated mind, it is as if he performs Shraddha for a thousand years - this is the ultimate secret that the ancestors themselves say. 12-14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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