श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 13: आभ्युदयिक श्राद्ध, प्रेतकर्म तथा श्राद्धादिका विचार  »  श्लोक 38-39
 
 
श्लोक  3.13.38-39 
पितृमातृसपिण्डैस्तु समानसलिलैस्तथा।
सङ्घातान्तर्गतैर्वापि राज्ञा तद्धनहारिणा॥ ३८॥
पूर्वा: क्रियाश्च कर्तव्या: पुत्राद्यैरेव चोत्तरा:।
दौहित्रैर्वा नृपश्रेष्ठ कार्यास्तत्तनयैस्तथा॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
माता, पिता, सपिण्ड, समानोदक, समूह के सदस्य अथवा उसके धन का अधिकारी राजा ही पूर्ववत् अनुष्ठान कर सकता है; किन्तु आगे का अनुष्ठान पुत्र, पौत्र आदि अथवा उनकी सन्तान को ही करना चाहिए ॥38-39॥
 
Mother, father, Sapinda, Samanodaka, members of the group or the king who is entitled to his wealth can perform the previous rituals; but the subsequent rituals should be performed only by the son, grandson etc. or their children. ॥38-39॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)