श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 13: आभ्युदयिक श्राद्ध, प्रेतकर्म तथा श्राद्धादिका विचार  »  श्लोक 33-34
 
 
श्लोक  3.13.33-34 
कुलद्वयेऽपि चोच्छिन्ने स्त्रीभि: कार्या: क्रिया नृप॥ ३३॥
सङ्घातान्तर्गतैर्वापि कार्या: प्रेतस्य च क्रिया:।
उत्सन्नबन्धुरिक्थाद्वा कारयेदवनीपति:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! जब मातृकुल और पितृकुल दोनों नष्ट हो जाएँ, तब केवल स्त्री ही इस संस्कार को करे; अथवा (यदि स्त्री न हो) तो किसी सखा को यह संस्कार करना चाहिए। अथवा राजा को स्वयं अपने धन से उस मृतक का सम्पूर्ण संस्कार करना चाहिए, जिसके कोई सम्बन्धी न हों। ॥33-34॥
 
O King! When both the maternal and paternal families are destroyed, only a woman should perform this ritual; or [if there is no woman] one of the companions should do it. Or the king himself should perform all the rituals of the deceased who has no relatives, using his wealth. ॥ 33-34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)