श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 13: आभ्युदयिक श्राद्ध, प्रेतकर्म तथा श्राद्धादिका विचार  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.13.14 
चतुर्थेऽह्नि च कर्तव्यं तस्यास्थिचयनं नृप।
तदूर्ध्वमंगसंस्पर्शस्सपिण्डानामपीष्यते॥ १४॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! अपवित्रता के चौथे दिन अस्थि-चयन करना चाहिए; उसके बाद ही अपने सपिण्ड सम्बन्धियों के शरीर के अंगों का स्पर्श करना चाहिए ॥14॥
 
O King, the asthi-selection should be done on the fourth day of the period of impurity; only after that can the body parts of one's Sapinda relatives be touched. ॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)