श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 12: गृहस्थसम्बन्धी सदाचारका वर्णन  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  3.12.44 
प्रियमुक्तं हितं नैतदिति मत्वा न तद्वदेत्।
श्रेयस्तत्र हितं वाच्यं यद्यप्यत्यन्तमप्रियम्॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
यदि कोई प्रिय वाक्य को अहितकर समझता हो, तो उसे नहीं कहना चाहिए; ऐसी स्थिति में हितकर वाक्य कहना ही श्रेयस्कर है, चाहे वह अत्यन्त अप्रिय ही क्यों न हो ॥44॥
 
If one considers a pleasant sentence to be harmful, then one should not say it; in such a situation it is better to say a beneficial sentence, even if it is very unpleasant. ॥ 44॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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