vedamrit
Reset
Home
ग्रन्थ
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
श्रीमद् भगवद गीता
______________
श्री विष्णु पुराण
श्रीमद् भागवतम
______________
श्रीचैतन्य भागवत
वैष्णव भजन
About
Contact
श्री विष्णु पुराण
»
अंश 3: तृतीय अंश
»
अध्याय 1: पहले सात मन्वन्तरोंके मनु, इन्द्र, देवता, सप्तर्षि और मनुपुत्रोंका वर्णन
»
श्लोक 43
श्लोक
3.1.43
त्रिभि: क्रमैरिमाँल्लोकाञ्जित्वा येन महात्मना।
पुरन्दराय त्रैलोक्यं दत्तं निहतकण्टकम्॥ ४३॥
अनुवाद
उन महात्मा वामनजी ने अपने तीन पगों से सम्पूर्ण लोकों को जीत लिया था और यह अखण्ड त्रिलोकी इन्द्र को दे दी थी ॥43॥
That Mahatma Vamanji had conquered all the worlds with his three steps and given this uninterrupted Triloki to Indra. 43॥
✨ ai-generated
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd