श्री विष्णु पुराण  »  अंश 3: तृतीय अंश  »  अध्याय 1: पहले सात मन्वन्तरोंके मनु, इन्द्र, देवता, सप्तर्षि और मनुपुत्रोंका वर्णन  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  3.1.43 
त्रिभि: क्रमैरिमाँल्लोकाञ्जित्वा येन महात्मना।
पुरन्दराय त्रैलोक्यं दत्तं निहतकण्टकम्॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
उन महात्मा वामनजी ने अपने तीन पगों से सम्पूर्ण लोकों को जीत लिया था और यह अखण्ड त्रिलोकी इन्द्र को दे दी थी ॥43॥
 
That Mahatma Vamanji had conquered all the worlds with his three steps and given this uninterrupted Triloki to Indra. 43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)