श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 8: सूर्य, नक्षत्र एवं राशियोंकी व्यवस्था तथा कालचक्र, लोकपाल और गंगाविर्भावका वर्णन  »  श्लोक 95
 
 
श्लोक  2.8.95 
आभूतसम्प्लवं स्थानममृतत्वं विभाव्यते।
त्रैलोक्यस्थितिकालोऽयमपुनर्मार उच्यते॥ ९५॥
 
 
अनुवाद
जगत् के अन्त तक तत्त्वों का जो अस्तित्व है, उसे अमरत्व कहते हैं। तीनों लोकों के अस्तित्व तक की इस अवधि को अपुनर्मर (फिर मृत्यु न होना) कहते हैं॥ 95॥
 
The existence of the elements till the end of the world is called immortality. This period till the existence of the three worlds is called apunarmar (without death again).॥ 95॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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