श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 8: सूर्य, नक्षत्र एवं राशियोंकी व्यवस्था तथा कालचक्र, लोकपाल और गंगाविर्भावका वर्णन  »  श्लोक 93-94
 
 
श्लोक  2.8.93-94 
तेऽसम्प्रयोगाल्लोभस्य मैथुनस्य च वर्जनात्।
इच्छाद्वेषाप्रवृत्त्या च भूतारम्भविवर्जनात्॥ ९३॥
पुनश्च कामासंयोगाच्छब्दादेर्दोषदर्शनात्।
इत्येभि: कारणै: शुद्धास्तेऽमृतत्वं हि भेजिरे॥ ९४॥
 
 
अनुवाद
लोभ का अभाव, मैथुन का त्याग, कामना-द्वेष का अभाव, कर्मों का त्याग, कामों की चंचलता और वचनों के दोषों को देखना आदि के कारण मन शुद्ध होकर उसने अमरत्व प्राप्त कर लिया है ॥93-94॥
 
He has achieved immortality by becoming pure in mind due to the absence of greed, renunciation of sexual intercourse, absence of desire and hatred, renunciation of rituals, inconsistency of lust and seeing the faults of words etc. 93-94॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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