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श्री विष्णु पुराण
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अंश 2: द्वितीय अंश
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अध्याय 8: सूर्य, नक्षत्र एवं राशियोंकी व्यवस्था तथा कालचक्र, लोकपाल और गंगाविर्भावका वर्णन
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श्लोक 85
श्लोक
2.8.85
उत्तरं यदगस्त्यस्य अजवीथ्याश्च दक्षिणम्।
पितृयान: स वै पन्था वैश्वानरपथाद्बहि:॥ ८५॥
अनुवाद
अगस्त्य के उत्तर और अजवीथी के दक्षिण का जो मार्ग वैश्वानर मार्ग [जिसे मृगवीथी कहते हैं] से भिन्न है, वह पितृयानपथ है ॥85॥
The path to the north of Agastya and south of Ajavithi which is different from Vaishvanar Marg [called Mrigavithi] is the Pitriyaanpath. 85॥
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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