| श्री विष्णु पुराण » अंश 2: द्वितीय अंश » अध्याय 8: सूर्य, नक्षत्र एवं राशियोंकी व्यवस्था तथा कालचक्र, लोकपाल और गंगाविर्भावका वर्णन » श्लोक 76-79 |
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| | | | श्लोक 2.8.76-79  | प्रथमे कृत्तिकाभागे यदा भास्वांस्तदा शशी।
विशाखानां चतुर्थेंऽशे मुने तिष्ठत्यसंशयम्॥ ७६॥
विशाखानां यदा सूर्यश्चरत्यंशं तृतीयकम्।
तदा चन्द्रं विजानीयात्कृत्तिकाशिरसि स्थितम्॥ ७७॥
तदैव विषुवाख्योऽयं काल: पुण्योऽभिधीयते।
तदा दानानि देयानि देवेभ्य: प्रयतात्मभि:॥ ७८॥
ब्राह्मणेभ्य: पितृभ्यश्च मुखमेतत्तु दानजम्।
दत्तदानस्तु विषुवे कृतकृत्योऽभिजायते॥ ७९॥ | | | | | | अनुवाद | | हे मुने! जिस समय सूर्य कृत्तिका नक्षत्र के प्रथम भाग में अर्थात् मेष राशि के अन्त में हो और चन्द्रमा निश्चित रूप से विशाखा के चतुर्थ भाग में [अर्थात वृश्चिक राशि के प्रारम्भ में] हो; अथवा जब सूर्य विशाखा के तृतीय भाग अर्थात् तुला राशि के अन्तिम भाग को भोगता हो और चन्द्रमा कृत्तिका के प्रथम भाग अर्थात् मेषान्त में स्थित जान पड़ता हो, तभी यह 'विषुव' नामक अत्यन्त पवित्र काल कहलाता है; इस समय देवताओं, ब्राह्मणों और पितरों के निमित्त संतुलित भाव से दान देना चाहिए। यह समय दान ग्रहण करने के लिए देवताओं के खुले मुख के समान है। अतः 'विषुव' काल में दान करने वाला मनुष्य कृतार्थ हो जाता है। 76-79॥ | | | | Hey Mune! At the time when the Sun is in the first part of Krittikanakshatra i.e. at the end of Aries and the Moon is definitely in the fourth part of Vishakha [i.e. at the beginning of Scorpio]; Or when the Sun enjoys the third part of Vishakha i.e. the last part of Libra and the Moon appears to be situated in the first part of Krittika i.e. Meshanta, then only this is called a very sacred period called ‘Equinox’; At this time, for the purpose of deities, Brahmins and ancestors, one should give donations in a balanced manner. This time is like the open mouth of the gods for accepting donations. Therefore, a person who donates during the 'equinox' period becomes grateful. 76-79॥ | | ✨ ai-generated | | |
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