श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 8: सूर्य, नक्षत्र एवं राशियोंकी व्यवस्था तथा कालचक्र, लोकपाल और गंगाविर्भावका वर्णन  »  श्लोक 74-75
 
 
श्लोक  2.8.74-75 
दक्षिणं चोत्तरं चैव मध्यं वैषुवतं तथा।
शरद्वसन्तयोर्मध्ये तद्भानु: प्रतिपद्यते।
मेषादौ च तुलादौ च मैत्रेय विषुवत्स्थित:॥ ७४॥
तदा तुल्यमहोरात्रं करोति तिमिरापह:।
दशपञ्चमुहूर्तं वै तदेतदुभयं स्मृतम्॥ ७५॥
 
 
अनुवाद
उनमें से एक श्रृंग उत्तर में, एक दक्षिण में और एक मध्य में है। मध्य श्रृंग ही 'वैशुवत' है। शरद और वसन्त ऋतु के मध्य में सूर्य इसी वैशुवतश्रृंग में आते हैं; अतः हे मैत्रेय! मेष या तुला राशि के प्रारम्भ में तिमिरापहारी सूर्यदेव भूमध्य रेखा पर स्थित होकर दिन-रात को समान अवधि का बनाते हैं। उस समय ये दोनों पंद्रह मुहूर्त होते हैं। 74-75॥
 
One of those horns is in the north, one in the south and one in the middle. The middle horn itself is ‘Vaishuvat’. In the middle of autumn and spring season, the Sun comes to this Vaishuvatashringa; Therefore, O Maitreya! At the beginning of Aries or Libra, the Timirapahari Sun God gets situated on the equator and makes day and night of equal length. At that time both of these are fifteen Muhuratkas. 74-75॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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