श्री विष्णु पुराण  »  अंश 2: द्वितीय अंश  »  अध्याय 8: सूर्य, नक्षत्र एवं राशियोंकी व्यवस्था तथा कालचक्र, लोकपाल और गंगाविर्भावका वर्णन  »  श्लोक 65-66
 
 
श्लोक  2.8.65-66 
दशपञ्चमुहूर्तं वै अहर्वैषुवतं स्मृतम्॥ ६५॥
वर्द्धते ह्रसते चैवाप्ययने दक्षिणोत्तरे।
अहस्तु ग्रसते रात्रिं रात्रिर्ग्रसति वासरम्॥ ६६॥
 
 
अनुवाद
विषुव दिन पंद्रह मुहूर्त का होता है, किन्तु उत्तरायण और दक्षिणायन में वह क्रमशः बढ़ने और घटने लगता है। इस प्रकार उत्तरायण में दिन रात्रि को और दक्षिणायन में रात्रि दिन को ग्रसित करती रहती है।॥ 65-66॥
 
The equinox day is of fifteen muhurtas, but in Uttarayan and Dakshinayan it starts increasing and decreasing respectively. Thus in Uttarayan the day starts consuming the night and in Dakshinayan the night keeps consuming the day.॥ 65-66॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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